संख्याओं को लिखने की स्थानीय मान पर आधारित आज की दाशमिक पद्धति का जो रूप हमारे सामने है, ये दो हजार साल पुराना भी नहीं है। विश्व की अलग-अलग सभ्यताओं जैसे यूनानी, मिस्रकालीन, चीनी, भारतीय आदि के संख्याओं को लिखने के अलग-अलग नियम थे। प्राचीन सभ्यताओं में संख्याओं के निरूपण का तरीका आज के प्रयोग किए जाने वाले तरीके से भिन्न था। संख्याओं के लिखने के ऐतिहासिक क्रम को स्थानीय मान के आलोक में देखें तो स्थानीय मान की अवधारणा का एक विकास क्रम नजर आता है। इस विकासक्रम की समझ, स्थानीय मान के सीखने सिखाने को प्रभावित करता। संख्याओं के लिखने के तरीकों को मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है -
संख्याओं को लिखने का पहला
तरीका
इस प्रकार से संख्याएँ लिखने वाली
सभ्यताएं मिस्रकालीन (Egyptian), सुमेरू (Sumerian) और यूनानी
(Greeks) थी। इन सभ्यताओं में, कुछ संकेतों को तय करने के
बाद अन्य संख्याएँ निम्न नियमों के आधार लिखी आती थी -
· कुछ निर्धारित
मान के संकेत परिभाषित करना, जिन्हें आज हम अंक कहते हैं।
· किसी
संख्या को लिखने के लिये निर्धारित संकेतों को बार-बार दोहराया
जाता था। संख्या का मान पूर्व निर्धारित संकेतों के मान को जोड़कर प्राप्त कर लिया
जाया था।
निम्न सारणी में यह विवरण भी दिया गया है
कि उपरोक्त सभ्यताएं किस प्रकार के संकेतों का प्रयोग कर संख्या लिखती थी। उस
संख्या को हमारी आज की दाशमिक पद्धति में कितना होता है। मिस्रकालीन संख्याओं की
जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत रिहंड पैपिरस (मूल नाम अहमिस पैपिरस) है। यह मिस्र
की प्राचीन पुस्तकों का अनुवाद है और इसे लगभग 1550 ई0 पू0 लिखा गया है। इन स्रोत
के द्वारा मिस्रवासियों की संख्या पद्धति का पता चलता है। सुमेरू सभ्यता के पडोस
में ही अक्काडियन सभ्यता भी निवास करती थी। अक्काडियन भी प्रमुखता से वही संख्या
संकेत प्रयोग करते थे जो कि सुमेरू करते थे लेकिन उन्होंने कुछ संकेत नये प्रयोग
किये।
इन नियमों से संख्याएँ लिखने पर बडी संख्याओं
में संकेत की लम्बाई कभी-कभी बहुत बढ जाती थी।
संख्याओं को लिखने का दूसरा
तरीका
इस प्रकार से संख्याएँ चीनी सभ्यता में
लिखी जाती थी। चीनी लोगों की संख्याओं को लिखने के नियम निम्न प्रकार हैं –
·
ये दो प्रकार के संख्या संकेतों का प्रयोग किया करते थे।
·
निर्धारित मान के पहले प्रकार के संकेतों के साथ
निर्धारित मान के दूसरे प्रकार के संकेतों को
लिखने पर बनी संख्या का मान दोनों मानो के गुणनफ़ल के बराबर होता है।
इनके पहले प्रकार के संकेत निम्नवत थे –

और दूसरे प्रकार के संकेत निम्न थे –

दोनों प्रकार के संकेतों को मिलाकर
किसी संख्या को निम्नवत बनाया जाता था -

संख्याओं को लिखने का तीसरा प्रकार
इस प्रकार से संख्याएँ लिखने वाली
सभ्यताएं हिन्दू, बैबीलोनियाई थी। चीन में 1122 ई0 पू0 का एक अभिलेख मिलता है। इसे
चीनी भाषा में आइकिंग कहा जाता है। इस आइकिंग पर कुछ संकेत उकेरे गए है, जिनकी
व्याख्या कुछ इतिहासकारों, गणितज्ञों द्वारा चीन के किसी हिस्से में प्रयोग की जाने
वाली संख्याओं के रूप में किया गया है। मानना है कि इन संख्याओं को लिखने का नियम
वही है जिन नियमों का प्रयोग हिन्दू और बैबीलोनियाई सभ्यताएं करती थी। तीसरे
प्रकार में संख्याएँ लिखने के निम्नलिखित नियम होते थे -
·
निश्चित मान के कुछ संकेत तय कर दिये जाते है जिन्हें
अंक कहा जा सकता है।
·
जिस स्थान पर अंक लिखा जाता है उस स्थान का एक निर्धारित
मान होता है। इस पद्धति की पूर्ण संख्या में पहले स्थान का मान एक के बराबर होता
है, और उसके
बाद के स्थानों का मान को, उस पद्धति के कुल अंको की संख्या
के गुने के रूप में समझा जा सकता है।
·
हर स्थान पर लिखे अंक को उसके स्थान के मान के साथ गुणा
करने पर मिली मात्राओं को जोड़ने से पूरी संख्या का मूल्य मिल जाता है।
ऊपर जिस चीनी आइकिंग का
जिक्र किया गया है उस पर निम्न प्रकार के
संकेत उकेरे गए थे -
ऐसा मानना है कि
‘शून्य’ तथा
‘एक’
है तथा यह द्विआधारी पद्धति में संख्याएँ हैं। पद्धति की संख्याओं की संरचना –


ऐसा माना जाता है कि
बैबीलोनियाई लोग भी तीसरे प्रकार के नियमों के आधार पर अपनी संख्याएँ लिखते थे।
बैबीलोनियाई सभ्यता में 59 तक की संख्याओं को लिखने के नियम वही थे जो कि
मिस्रवासियों या सुमेरू लोगों के थे। लेकिन59 से बड़ी संख्याओं को लिखने के लिए ये तीसरे
प्रकार के नियमों का प्रयोग करते थे। ये अपनी संख्यायें निम्न प्रकार से बनाते थे
-
यद्यपि बैबीलोनियाई लोगो के संख्या को लिखने के नियम आज के संख्याओ को लिखने के नियमो से काफी
मिलते जुलते है फिर भी इनकी संख्या लिखने की पद्धति पूरी तरह से सुसंगत नहीं
थी।
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